15 अगस्त का दिन हर साल आता है। लाल किले से भाषण दिए जाते हैं, आसमान में तिरंगे लहराते हैं और लाउडस्पीकरों पर देशभक्ति के गीत बजते हैं। ‘आजादी का महापर्व’ कहकर हर तरफ ढोल पीटे जाते हैं। ऐसे में आज हर जागरूक नागरिक के मन में एक तीखा सवाल चुभ रहा है, क्या हम सच में आजाद हैं? अगर आजाद हैं, तो किस बात की आजादी?
जिस भारत को ‘सोने की चिड़िया’ कहा जाता था, उसे आज कुछ लोगों की तानाशाही सोच, भ्रष्टाचार और सत्ता की भूख ने बर्बादी की कगार पर ला खड़ा किया है। जो देश न्याय, समानता और अभिव्यक्ति की आजादी की बुनियाद पर खड़ा हुआ था, आज वहां सवाल पूछने वालों को देशद्रोही और आतंकवादी करार दिया जा रहा है। आखिर ये लोग कौन हैं जो देश को डुबाने की कोशिश कर रहे हैं?
1. शिक्षा, युवा और पेपर लीक का खेल
देश के भविष्य यानी युवाओं के साथ जो भद्दा मजाक हो रहा है, उसने पूरी शिक्षा व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है।
NEET परीक्षा पेपर लीक: सालों-साल दिन-रात मेहनत करने वाले छात्रों के सपनों को एक झटके में बेच दिया जाता है।
हक मांगने पर लाठियां और बदसलूकी: जब पेपर लीक के खिलाफ छात्र सड़कों पर उतरते हैं, तो उन्हें दिलासा देने के बजाय उन पर बर्बरता से लाठीचार्ज किया जाता है। विरोध करने वाले छात्रों को ‘दहशतगर्द’ तक कह दिया जाता है। प्रदर्शन के दौरान पुलिस कर्मियों द्वारा छात्राओं के साथ गलत व्यवहार और बदसलूकी की खबरें आत्मा को झकझोर देती हैं।
डिग्री हाथ में पर काम शून्य: लाखों युवा डिग्रियां लेकर घूम रहे हैं लेकिन नौकरी नहीं है। सरकारी नौकरियों में लाखों आवेदकों के लिए सीटें बेहद कम हैं और युवाओं के कई साल तैयारी में ही बर्बाद हो जाते हैं। प्राइवेट सेक्टर में कम वेतन और अत्यधिक काम के कारण युवाओं का शोषण हो रहा है।
2. कानून व्यवस्था, पुलिस प्रशासन और महिलाओं की सुरक्षा
देखने की बात यह है कि, जहाँ पुलिस का काम आम जनता की सुरक्षा करना होना चाहिए था, वहाँ आज तस्वीरें कुछ और ही कहानी बयां करती हैं।
नेताओं की चाकरी में पुलिस
पुलिस प्रशासन आम जनता की सुरक्षा के बजाय नेताओं के आगे-पीछे घूमता नजर आता है। अपराधियों में पुलिस का कोई खौफ नहीं बचा है।
महिलाओं और मासूमों पर अत्याचार
बच्चियों और महिलाओं के साथ यौन अपराध (Rape) की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। सख्त कार्रवाई करने के बजाय कई बार संगीन आरोपियों और रेपिस्टों को राजनीतिक संरक्षण दिया जाता है। दूसरा, उन्हें पार्टियों में शामिल तक कर लिया जाता है। दहेज के नाम पर महिलाओं की हत्या और प्रताड़ना आज भी कुछ जगहों पर जारी है।
मणिपुर की आग और पर्यावरण की तबाही
महीनों तक मणिपुर जलता रहा लेकिन तंत्र मौन रहा। वहीं दूसरी तरफ विकास के नाम पर पेड़ों की अंधाधुंध कटाई हो रही है और खस्ताहाल सड़कों के कारण रोज हादसे हो रहे हैं। इन सबके बावजूद कोई जवाबदेही तय नहीं होती।
3. महंगाई, टैक्स का बोझ और मिडिल क्लास का दर्द
कमाई भले बढ़ी न हो लेकिन आम आदमी का खर्च कई गुना बढ़ चुका है। मिडिल क्लास आज कर्ज और महंगाई के बीच पिस रहा है।
- रसोई से लेकर पेट्रोल का बजट बिगड़ा: पेट्रोल-डीजल के दाम आसमान छू रहे हैं। एलपीजी (LPG) और राशन की बढ़ती कीमतों ने हर घर का बजट बिगाड़ दिया है।
- महंगी शिक्षा और इलाज: बच्चों की स्कूल फीस और अस्पतालों का मेडिकल खर्च इतना बढ़ गया है कि, इलाज और पढ़ाई आम आदमी की पहुंच से बाहर होती जा रही है।
4. किसान, सड़कें और खस्ताहाल बुनियादी ढांचा
देश का पेट भरने वाला अन्नदाता आज भी अपने हक के लिए तरस रहा है।
- किसानों का आंदोलन: अपनी फसलों के सही दाम और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की मांग को लेकर किसानों को बार-बार सड़कों पर उतरना पड़ रहा है और लाठियां खानी पड़ रही हैं।
- टूटी सड़कें और बदहाल व्यवस्था: आम नागरिक हर चीज पर टैक्स भरता है लेकिन बदले में उसे गड्ढों से भरी खराब सड़कें और बदहाल बुनियादी ढांचा मिलता है।
5. मीडिया, अभिव्यक्ति की आजादी और ED का खौफ
लोकतंत्र के चौथे स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया के रवैये को देखकर आज हर कोई हैरान और शर्मसार है।
क्या मीडिया बिक चुका है?
निष्पक्ष पत्रकारिता की जगह चाटुकारिता ने ले ली है। जो पत्रकार सच बोलना चाहता है, उसे दबा दिया जाता है या नौकरी से निकाल दिया जाता है।
Freedom of Speech पर ताला
सरकार के खिलाफ बोलने या सवाल पूछने पर सोशल मीडिया अकाउंट्स बंद करा दिए जाते हैं। असहमति की हर आवाज को दबाने के लिए ED, CBI और पुलिस का इस्तेमाल किया जा रहा है।
6. धर्म की राजनीति और वोट बैंक का खेल
जब-जब चुनाव करीब आते हैं, असली मुद्दों को दरकिनार करके धर्म का कार्ड खेला जाता है।
- असली मुद्दों से भटकाव: रोजगार, शिक्षा, महंगाई और अस्पतालों पर बात करने के बजाय हिंदू-मुस्लिम के मुद्दों पर राजनीति की जाती है।
- धार्मिक स्थलों और आस्था पर राजनीति: राम मंदिर जैसे आस्था के केंद्रों में भी चोरी और घोटालों की खबरें सामने आती हैं। धर्म के नाम पर वोट मांगकर सत्ता हासिल करना ही आज की राजनीति का मुख्य मकसद बन चुका है।
निष्कर्ष क्या? क्या यही है हमारे सपनों का भारत?
15 अगस्त के मौके पर हमें खुद से यह सवाल पूछना होगा कि, क्या हम वास्तव में स्वतंत्र हैं या फिर एक नई तरह की तानाशाही के गुलाम बन चुके हैं? सच्ची आजादी केवल साल में एक बार झंडा फहराने और देशभक्ति के नारे लगाने से नहीं मिलती।
आजादी तब सार्थक होगी जब हर युवा को सम्मानजनक रोजगार मिले, हर बेटी सुरक्षित हो, अन्नदाता को उसका हक मिले, मीडिया निष्पक्ष होकर सच दिखाए और देश का हर नागरिक बिना किसी डर के सवाल पूछ सके। जब तक ये अधिकार हमें नहीं मिलते, तब तक “आजादी का महापर्व” सिर्फ एक दिखावा बनकर रह जाएगा।
अंत में तो मेरे लिए और हम सबके लिए एक ही बात याद आती है कि…
“मेरा कर्मा तू, मेरा धर्मा तू
तेरा सब कुछ मैं, मेरा सब कुछ तू
हर करम अपना करेंगे, ऐ वतन तेरे लिए
दिल दिया है, जां भी देंगे, ऐ वतन तेरे लिए”
देशभक्ति का यह गीत “ऐ वतन तेरे लिए” फिल्म ‘कर्मा’ का है, जिसे कविता कृष्णमूर्ति और मोहम्मद अजीज ने अपनी दमदार आवाजों से सजाया था। इसका संगीत महान संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने तैयार किया था और इसके दिल को छू लेने वाले बोल प्रसिद्ध गीतकार आनंद बक्शी ने लिखे थे।
व्यवस्था की कमियों और राजनीति की नाकामियों पर सवाल उठाने का मतलब देश से शिकायत नहीं बल्कि देश को बेहतर बनाने की तड़प है। चाहे हालात कुछ भी हों, इस मिट्टी और वतन के प्रति हमारी निष्ठा कभी कम नहीं हो सकती।
